कविता
शीर्षक ----- घर
घरवालों से घर था पहले,
तब घर को मंदिर कहते थे
कहां रह गए पहले जैसे
जो घर को घर है कह सकते।।
पहले के हर घर घर में,
सुख साधन नजर नहीं आते।
घर पर रहने वालों के
चेहरे खिले हुए से रहते ।।
ऊंची दीवारें ना थी घर की,
ना संगमरमर के थे आंगन,
हंसी ठिठोली चहल पहल से
मधुर गूंजते उत्सव के स्वर ।।
एसी कूलर फ्रिज भी नहीं थे,
पेड़ों की छांव से ठंडक थी।
मिट्टी के घरों की सोंधी खुशबू,
मन को तृप्त कराती थी ।।
सुख दुख आते कब जाते थे,
कभी पता ना चल पाता ।
जैसे सुख में साथ खड़े थे
वैसा ही दुख सबका अपना ।।
अब घर नहीं मकान बन गए
प्यार नहीं व्यापार हो गए।
रिश्ते अब दरकिनार कर रहे
परिवार ही रिश्तेदार बन गए ।।
मकान भी एक समस्या बन गए
सबके बीच मेरा तुम्हारा कर गए
चलो मिलकर दूरियां मिटा ले
अब मकान में अपना घर बना ले।।
पुष्पा मिश्रा आनंद
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