हम मिलॆ न मिलें तो क्या
चर्चा होनी ही तो है
आग से झुलसी दिनचर्या
शाम के सीने पर रोनी ही तो है ,
बोते रहे रात भर प्रेमअश्रु
दूर टिमटिम तारों में ही तो है
भोर में दिशा तलाशते पथिक की
अंतिम आस टूटनी ही तो है
बिछड़ने की बेदना में
पीड़ा की शुरुआत ही तो है
प्रेम की नजदीकियों का प्रायश्चित
एक अंत ही तो है
हमारे हिस्से का दर्द मत बाँटो
बस शब्दों से मुझे कहना ही तो है
ये ऐसा उधार घर कर गया है
इसे जीवंत चुकाना ही तो है
निभा सिंह चौधरी
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