विषय : ----
सुरभित मुखरित पर्यावरण
********************
रचनाकार: दीपांजली दुबे
धरा के मर्म को समझें ,
चलो उपवन लगाएं हम।
कलुषित वन प्रदूषण को,
नवीनतम कर जग को बताएं हम।
सुरभित मुखरित पर्यावरण ,
उपहार जीवन का इसे स्वीकार करते हम।
दुग्ध सी धवल धरा आतुर है निखरने को ,
शान्त शुभ्र उज्ज्वला ,
रश्मि दीप्त वसुंधरा ,मचलने को
प्रकृति वरदान ईश्वर का ,
इसे क्यों कर गवाएं हम ,
पक्षियों को क्षितिज दें हम,
भले दूषित बवंडर मे उन्हें उड़ना सिखाएं हम।
उठाएं उक्त कदम अब तो ,
धरा को प्रदूषण मुक्त करके हम ।
वृक्षारोपण कर प्रकृति का मान रक्खें हम।
किये उपकार वसुधा ने बहुत हम पर,
कृतघ्न इतने भी बने न हम।
शोषण प्रकृति का बंद करें अब हम।
धरा ने भी भुलाया तो हमारा जीवन असंभव है ।
न भूलें अब प्रकृति को हम।
स्मृति ये रहें मन मे,जगाएं हर मनुज को हम।
सरिता झरने सूख रहे रोता हुआ कटाव मिला ।
जंगल पर्वत दूर हुये वसुधा पर बढ़ा तनाव मिला ।
खनिज संपदा हरने को ,
मानुष का सख्त स्वभाव मिला।
सरित शुभ्र उज्ज्वल वसुधा पर ,
कलुषित वायु का स्राव मिला ।
पीपल, बरगद संजीवनी औषधि को नष्ट कर शहरीकरण निर्माण कर हम?
नव युग के लिए क्या उपहार देंगे हम?
गगन में पाँव रखती उन इमारतों मे प्रदूषण का क्या धुआं देंगे हम?
निर्मल धार हुई मटमैली हमको
प्रकृति का सख्त बहाव मिला।
मृगतृष्णा से हारे सारे नभ मे ओझल से हैं तारे ।
प्रकृति प्रेम की शुरभि प्रभा बन ,
आभाषित परिभाषित सारे,
शब्द धुंध की इच्छा ओढ़े ,
त्राहिमाम का भाव मिला ।
हिम के उच्च शिखर पे भी हमको पत्थर मे भी देवों का प्रभाव मिला।
अभी भी वक्त है सम्भलने का,
धरा के मर्म को समझें,
चलो उपवन लगाएं हम।
सुरभित मुखरित पर्यावरण ।
उपहार जीवन का इसे स्वीकार करते हम।
स्वरचित मौलिक रचना अप्रकाशित
दीपांजली दुबे
कानपुर ।
उत्तर प्रदेश ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें