आज की कविता......
*बरखा रानी*
बरखा रानी,क्यूं इतना इतराती हो
इक झलक दिखाकर,
एक आश जगाकर,
आंखों से ओझल हो जाती हो।।
मन मयूर सपने देख तुम्हारे,
हर्षित ,पुलकित हो जाता है।
फिर मधुकर बन,
गुनगुन गीत सुनाता है।
लेकिन तुम तो बस इठलाती हो।
एक झलक..........
माटी की महक-सा इत्र,
तुम बिन कैसे बन सकता है?
और बिन माटी पर लिखें,
कहीं ,कोई कवि बन सकता है?
लेकिन जाने क्यूं तुम कतराती हो?
एक झलक..........
मुझको करनी है तुमसे दो बातें,
छाता,रेनकोट जैसे हो सौगातें।
मेरी हंसी उड़ाते हैं,
लेकिन तुम बस बलखाती हो।
एक झलक..........
काली बदली जब धरती को घेरे,
नई-नई आशाओं के डलते डेरे।
सखी हवा संग जाने कहां तुम खो जाती हो।
एक झलक..........
इंद्रधनुषमय हो नील गगन,
हरित चुनरी में ,करें वसुधा नर्तन।
नाचे-गावे ,सब जन-मन,
लेकिन तुम क्यों सबको भरमाती हो।
एक झलक..........
माना हमने, की थी मनमानी,
नहीं करेंगे अब नादानी।
करके क्षमा कर दो ,पानी-पानी,
क्यों मंद-मंद मुस्काती हो।
एक झलक..........
दिनांक-8 जुलाई,2020
पुष्पा शर्मा
ग्वालियर,मध्य प्रदेश
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