*मेरे हमराह*
साथ चलने की मेरे यार को आदत ही कहां थी,
वो मेरे दिल में था, अब किसी की ज़रूरत ही कहां थी
मैं धूप- धूप थी, वो छावं- छावं था,
मिलने की उसको, फुर्सत ही कहां थी
कहते हैं वो हमसे, कि हम परछाईं हैं तुम्हारी, पर
जब गम का अंधेरा था, तो वो परछाईं ही कहां थी
कभी तो शायद मुड़कर बुला लेगा वो मुझे,
इस बात की अब मेरे दिल को, उम्मीद ही कहां थी
नेहा सक्सेना
शिवपुरी, म. प्र.
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